सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: डिप्टी रजिस्ट्रार की बर्खास्तगी रद्द, पेरियार यूनिवर्सिटी में सेवा बहाली का आदेश सरवणन को आय से अधिक संपत्ति के आरोप में नौकरी से हटाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूतों के बर्खास्तगी जैसे कठोर दंड को उचित नहीं ठहराया जा सकता। नई दिल्ली। सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में ठोस सबूत और निष्पक्ष जांच कितनी महत्वपूर्ण हैं, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने पेरियार यूनिवर्सिटी के डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवणन की सेवा बहाली को बरकरार रखते हुए मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ का फैसला रद्द कर दिया। सरवणन को कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में सेवा से बर्खास्त किया गया था। 16 अक्टूबर को दिए गए फैसले में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी किसी सरकारी कर्मचारी के लिए सबसे कठोर दंडात्मक कार्रवाई में से एक है। इसके परिणाम केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके परिवार और आजीविका पर भी गहरा असर डालते हैं। ‘बर्खास्तगी के गंभीर परिणाम, अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती’ सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि सेवा से बर्खास्तगी या निष्कासन का प्रभाव अत्यंत व्यापक होता है। इससे कर्मचारी के सेवा संबंधी लाभ प्रभावित होते हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब किसी दंड के परिणाम इतने गंभीर हों, तो न्यायिक समीक्षा करने वाली अदालत उचित मामलों में मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। यदि बर्खास्तगी का आदेश ठोस सबूतों के बजाय अनुमानों और अटकलों पर आधारित हो, तो उसमें हस्तक्षेप किया जा सकता है। आय से अधिक संपत्ति के आरोपों पर नहीं मिले पर्याप्त सबूत मामले में विश्वविद्यालय की ओर से गठित एक सदस्यीय आयोग ने जांच की थी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट की एकल-न्यायाधीश पीठ ने आयोग की रिपोर्ट और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया था कि सरवणन के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि विभागीय कार्रवाई में दर्ज निष्कर्षों के समर्थन में कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत होने चाहिए। केवल संदेह, अनुमान या अटकलों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराकर बर्खास्त करना उचित नहीं है। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जब आयोग की रिपोर्ट में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं थी, तो विश्वविद्यालय की सिंडिकेट ने उस रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए क्या ठोस कारण दिए थे। मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ का आदेश रद्द इस मामले में हाई कोर्ट की एकल-न्यायाधीश पीठ ने पहले सरवणन की सेवा बहाली का आदेश दिया था। बाद में खंडपीठ ने उस फैसले में हस्तक्षेप किया। सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के आदेश को रद्द करते हुए एकल-न्यायाधीश पीठ के फैसले को बरकरार रखा। विश्वविद्यालय की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि कर्मचारी के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था, इसलिए रिट याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपयुक्त मामलों में हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है, खासकर तब जब किसी आदेश में कानूनी त्रुटि, अतार्किक निष्कर्ष या प्रक्रिया संबंधी गंभीर खामी दिखाई दे। अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का महत्व सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य यह जांचना भी है कि प्रशासनिक या अनुशासनात्मक आदेश कानून के अनुरूप है या नहीं। यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ निष्कर्ष बिना सबूत के निकाले गए हों या कानून में स्वीकार्य न होने वाले अनुमानों पर आधारित हों, तो हाई कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। पीठ के अनुसार, बिना साक्ष्य के दर्ज निष्कर्षों को उचित न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। ऐसे मामलों में सवाल केवल सबूतों की व्याख्या का नहीं, बल्कि यह भी होता है कि संबंधित निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से समर्थित हैं या नहीं। यह फैसला विभागीय जांच और सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में निष्पक्षता, प्रमाण और न्यायिक समीक्षा की अहमियत को रेखांकित करता है।