Meta की बढ़ी मुश्किलें! डीपफेक और एल्गोरिदम पर सरकार सख्त, 'इंटरमीडियरी' दर्जे पर सवाल नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Meta की भारत में मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। Facebook और Instagram पर डीपफेक, AI से तैयार किए गए भ्रामक कंटेंट और उसकी पहुंच को लेकर सरकार ने कंपनी के सामने कड़े सवाल रखे हैं। सरकार ने प्लेटफॉर्म पर हानिकारक और भ्रामक AI कंटेंट को तेजी से रोकने की जरूरत पर जोर दिया है। मामला सिर्फ कंटेंट हटाने तक सीमित नहीं है। सरकार इस बात पर भी सवाल उठा रही है कि जब किसी प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम यह तय करता है कि कौन सा कंटेंट ज्यादा यूजर्स तक पहुंचेगा, तो क्या कंपनी को सिर्फ एक सामान्य 'इंटरमीडियरी' माना जा सकता है? क्या Meta का इंटरमीडियरी दर्जा खतरे में है? भारत के सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कुछ परिस्थितियों में 'इंटरमीडियरी' के रूप में कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे आमतौर पर Safe Harbour Protection के तौर पर जाना जाता है। इस व्यवस्था में यूजर द्वारा अपलोड किए गए हर कंटेंट के लिए प्लेटफॉर्म को सीधे जिम्मेदार नहीं माना जाता, बशर्ते वह कानून में निर्धारित शर्तों और जरूरी सावधानियों का पालन करे। अब सरकार की चिंता इस बात को लेकर है कि Meta के प्लेटफॉर्म केवल यूजर द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट को होस्ट नहीं करते, बल्कि उनके एल्गोरिदम और recommendation systems यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि किसी पोस्ट या वीडियो की पहुंच कितनी बढ़ेगी। एल्गोरिदम को लेकर सरकार की आपत्ति Facebook और Instagram पर हर दिन बड़ी मात्रा में वीडियो, फोटो और अन्य पोस्ट अपलोड होती हैं। ऐसे में सभी यूजर्स को एक जैसा कंटेंट दिखाई नहीं देता। प्लेटफॉर्म का recommendation algorithm यूजर की गतिविधियों और अन्य संकेतों के आधार पर कंटेंट चुनता है और उसे अलग-अलग लोगों तक पहुंचाता है। सरकार इसी व्यवस्था को लेकर जवाबदेही का सवाल उठा रही है। अगर किसी कंटेंट को एल्गोरिदम ज्यादा लोगों तक पहुंचाता है, तो सरकार यह जानना चाहती है कि उस प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी किस सीमा तक तय होनी चाहिए। डीपफेक कंटेंट पर भी सरकार सख्त बैठकों में AI से बनाए गए डीपफेक कंटेंट का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। डीपफेक ऐसी तकनीक है जिसमें AI की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या वीडियो को इस तरह बदला जा सकता है कि वह वास्तविक दिखाई दे। इसका इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने या लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे हानिकारक कंटेंट की पहचान और कार्रवाई के लिए प्रभावी सिस्टम तैयार रखें। सरकार ने Meta से क्या कहा? सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों को लेकर कई मुद्दे उठाए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से: 1. डीपफेक पर तेजी से कार्रवाई: AI से बनाए गए हानिकारक या भ्रामक कंटेंट की पहचान कर जरूरी कार्रवाई की जाए। 2. कंटेंट मॉडरेशन मजबूत करना: ऐसे कंटेंट को वायरल होने से पहले रोकने के लिए प्रभावी मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार किए जाएं। 3. एल्गोरिदम में जवाबदेही: यह स्पष्ट किया जाए कि recommendation systems किस तरह कंटेंट की पहुंच बढ़ाते हैं। 4. भारतीय कानूनों का पालन: भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देश के लागू कानून और IT Rules का पालन करना होगा। Safe Harbour Protection क्या है? Safe Harbour को आसान भाषा में समझें तो यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कुछ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, कोई यूजर किसी प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक या गलत जानकारी पोस्ट करता है तो हर मामले में प्लेटफॉर्म को स्वतः उस कंटेंट का निर्माता नहीं माना जाता। हालांकि यह सुरक्षा बिना शर्त नहीं होती। प्लेटफॉर्म को निर्धारित कानूनी दायित्वों का पालन करना होता है और कानून के तहत जरूरी कार्रवाई करनी होती है। यही वजह है कि सरकार अब यह देख रही है कि बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपनी भूमिका को केवल 'मध्यस्थ' तक सीमित रखते हैं या कंटेंट की पहुंच तय करने में उनकी सक्रिय भूमिका भी है। क्या तुरंत खत्म हो जाएगा Meta का Safe Harbour? फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि Meta का इंटरमीडियरी दर्जा तत्काल खत्म हो गया है। सरकार की ओर से उठाए गए सवाल और संभावित कानूनी बदलाव को लेकर चर्चा चल रही है। इसलिए अभी इसे संभावित नियामकीय कार्रवाई के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि Meta के Safe Harbour Protection के समाप्त होने के अंतिम फैसले के रूप में। अगर भविष्य में कानून या किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत प्लेटफॉर्म की सुरक्षा प्रभावित होती है, तो कंपनी के लिए कानूनी और अनुपालन संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। सिर्फ Meta ही नहीं, दूसरे प्लेटफॉर्म भी निगरानी में सोशल मीडिया पर AI-generated content और deepfake के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए सरकार का फोकस केवल Meta तक सीमित नहीं है। Facebook और Instagram के अलावा दूसरे बड़े सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म की भूमिका पर भी सवाल उठाए