अमित शाह के राजस्थान दौरे पर सवाल: अलवर में छात्र हिरासत में, निंबाहेड़ा में अटल प्रतिमा का अनावरण; युवा पूछ रहा है—हमारे सवालों का जवाब कब? अलवर/निंबाहेड़ा: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का राजस्थान दौरा रविवार को विकास, राजनीति और राष्ट्रवाद के कई रंग दिखा गया। अलवर में डेयरी प्लांट और विकास परियोजनाओं की शुरुआत हुई, जबकि निंबाहेड़ा में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा का अनावरण किया गया। लेकिन इसी दौरे के बीच छात्रों की हिरासत ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—जब युवा अपनी मांग लेकर सत्ता के सामने खड़ा हो, तो क्या उसे सुनने की जगह सिर्फ रोकना ही रास्ता है? अलवर में छात्र हिरासत में, काले झंडे दिखाने की थी तैयारी रिपोर्टों के मुताबिक, अमित शाह के अलवर कार्यक्रम से पहले कुछ कॉलेज छात्रों को पुलिस ने हिरासत में लिया। पुलिस के अनुसार, ये छात्र आरआर कॉलेज के पास प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में काले झंडे दिखाने की तैयारी कर रहे थे। छात्रों की बताई गई मांगों में शामिल थे: राजस्थान में छात्र संघ चुनाव बहाल करना। जंतर-मंतर पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाब मांगना। खराब सड़कों का मुद्दा उठाना। कथित मत्स्य घोटाले को लेकर सवाल उठाना। सरकार और प्रशासन तक छात्रों की आवाज पहुंचाना। छात्रों के पास हथियार थे या वे किसी सरकारी भवन पर कब्जा करने जा रहे थे—ऐसी बात उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आती। उनका इरादा विरोध दर्ज कराने और काले झंडे दिखाने का बताया गया है। बेशक, सार्वजनिक कार्यक्रम की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। पुलिस संभावित व्यवधान को रोकने के लिए निवारक कार्रवाई कर सकती है। लेकिन लोकतंत्र में दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है— क्या विरोध की आवाज सुनने के लिए कुछ मिनट निकालना लोकतंत्र की कमजोरी है या उसकी ताकत? युवा सिर्फ परीक्षा नहीं दे रहा आज का छात्र सिर्फ परीक्षा नहीं दे रहा। वह अपने भविष्य की परीक्षा भी दे रहा है। वह शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और अपने अधिकारों को लेकर सवाल पूछ रहा है। जंतर-मंतर से अलवर तक पहुंचा छात्र आंदोलन का सवाल अलवर में छात्रों के प्रस्तावित प्रदर्शन का एक मुद्दा दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए छात्र विरोध से भी जुड़ा बताया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, छात्रों ने वहां हुई कथित लाठीचार्ज कार्रवाई को लेकर भी विरोध दर्ज कराने की योजना बनाई थी। इस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की घटना-विशेष स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है, तो उसके पास रास्ता क्या है? सड़क पर आए तो पुलिस। संसद में मुद्दा उठे तो हंगामा। सोशल मीडिया पर बोले तो राजनीतिक आरोप। तो फिर युवा अपनी बात आखिर कहे कहां? यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक दिन की राजनीतिक खबर नहीं रहने देता। संसद में जवाब का इंतजार, राजस्थान में फिर वही सवाल मानसून सत्र के दौरान छात्र विरोध और पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव रहा। विपक्ष गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगता रहा, जबकि सरकार की ओर से चर्चा के लिए तैयार होने की बात कही गई। लेकिन संसद का सत्र हंगामे और गतिरोध के बीच समाप्त हो गया। अब वही सवाल राजनीतिक मंचों से उठ रहा है— अगर सरकार चर्चा के लिए तैयार थी तो चर्चा पूरी क्यों नहीं हो सकी? और अगर विपक्ष छात्र मुद्दे पर जवाब चाहता था, तो संसद को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी विपक्ष की भी थी। लोकतंत्र में सवाल सिर्फ सरकार से नहीं होते। विपक्ष से भी होते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल जनता का है— जिस मुद्दे पर संसद में बहस नहीं हो पाई, क्या उसका जवाब अब राजनीतिक भाषणों में मिलेगा? अलवर में विकास का मॉडल, लेकिन युवा का सवाल भी जरूरी अमित शाह ने अलवर में डेयरी और सहकारिता के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान राजस्थान में हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास की बात भी सामने आई। विकास जरूरी है। डेयरी जरूरी है। सड़क जरूरी है। अस्पताल जरूरी है। बुनियादी ढांचा जरूरी है। लेकिन शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है। और छात्र संघ चुनाव का मुद्दा भी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक प्रशिक्षण मानने वाले युवाओं के लिए यह प्रतिनिधित्व और अपनी आवाज रखने का सवाल भी है। इसलिए जब छात्र कहता है— "चुनाव कराओ।" तो उसका सवाल सिर्फ चुनाव का नहीं हो सकता। उसके पीछे यह भावना भी हो सकती है— "हमारे बारे में फैसले लेने वालों के सामने हमारी आवाज भी होनी चाहिए।" निंबाहेड़ा में अटल जी की प्रतिमा और पोखरण की याद अमित शाह ने निंबाहेड़ा में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 21 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया। कार्यक्रम में अटल जी की राजनीतिक विरासत और पोखरण परमाणु परीक्षणों का भी उल्लेख हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति की ऐसी शख्सियत रहे, जिन्हें उनकी राजनीतिक शैली, संसदीय बहस और लोकतांत्रिक संवाद के लिए भी याद किया जाता है। इसलिए जब अटल जी की प्रतिमा के सामने लोकतंत्र की बात होती है, तो एक सवाल अपने आप पैदा होता है— क्या अटल जी की राजनीति को सिर्फ प्रतिमाओं में याद किया जाएगा या उनके संसदीय संवाद और असहमति के सम्मान को भी आगे बढ़ाया जाएगा? यह सवाल किसी एक पार्टी का नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र का सवाल है। राष्ट्रवाद की बहस अपनी जगह, लेकिन युवा का भविष्य भी देशभक्ति है आज राजनीति में वंदे मातरम्, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, कांग्रेस और बीजेपी जैसे मुद्दों पर खूब बहस होती है। होनी भी चाहिए। लेकिन उसी समय— एक युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। एक लड़की सरकारी नौकरी का फॉर्म भर रही है। एक छात्र फीस जुटाने के लिए अपने परिवार पर निर्भर है। एक बेरोजगार युवा कई परीक्षाएं देने के बाद भी नियुक्ति का इंतजार कर रहा है। एक परिवार अपने बच्चे को शहर भेजकर पढ़ा रहा है। इन लोगों के लिए देशभक्ति का मतलब सिर्फ नारा नहीं है। उनके लिए देशभक्ति का मतलब एक ऐसा भारत भी है, जहां मेहनत करने वाले युवा को अवसर मिले। जहां: सरकारी स्कूल बेहतर हों। अस्पताल में इलाज मिले। परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा हो। रोजगार के अवसर बढ़ें। और सवाल पूछने पर युवा को अपराधबोध महसूस न हो। क्या राजनीति सिर्फ चुनाव तक सीमित हो गई है? कटाक्ष यही है कि चुनाव आते ही जनता सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। उसके बाद वही जनता अपने सवालों के साथ इंतजार करती रहती है। नेता कहते हैं— "जनता ने हमें चुना है।" जनता कहती है— "हां, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार भी हमें ही है।" और लोकतंत्र का असली मतलब शायद यही है। सरकार को सवाल पसंद आएं या न आएं, सवाल पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र की समस्या नहीं है। वह लोकतंत्र की पहचान है। अमित शाह से भी सवाल, विपक्ष से भी अमित शाह देश के गृह मंत्री हैं। इसलिए उनसे सवाल होना स्वाभाविक है। अगर छात्र पुलिस कार्रवाई पर जवाब चाहते हैं, तो सवाल है— क्या उनके सवालों का जवाब सार्वजनिक रूप से और विस्तार से नहीं दिया जाना चाहिए? अगर सरकार कहती है कि वह चर्चा के लिए तैयार थी, तो— फिर संसद में वह चर्चा क्यों नहीं हो पाई? और अगर छात्र अलवर में काले झंडे दिखाना चाहते थे, तो— क्या प्रशासन उनकी आवाज सुनने के लिए कोई वैकल्पिक संवाद नहीं कर सकता था? लेकिन विपक्ष से भी सवाल उतना ही सीधा है— अगर छात्रों का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है तो क्या उसे सिर्फ राजनीतिक हथियार बनाना पर्याप्त है? क्या छात्रों के साथ बैठकर समाधान निकालने की कोशिश भी उतनी ही जरूरी नहीं? आज राजस्थान में दो तस्वीरें दिखीं पहली तस्वीर: अमित शाह मंच पर हैं। विकास परियोजनाओं की घोषणा हो रही है। अटल जी की प्रतिमा का अनावरण हो रहा है। देश और राष्ट्रवाद की बातें हो रही हैं। दूसरी तस्वीर: छात्र अपनी मांगों के साथ खड़ा है। पुलिस उसे हिरासत में ले रही है। और उसके हाथ में शायद सिर्फ एक सवाल है— "हमारी बात कौन सुनेगा?" इन दोनों तस्वीरों के बीच ही आज का भारत खड़ा है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा कटाक्ष है— देश को विश्व शक्ति बनाने की बातें हो रही हैं, लेकिन उस शक्ति की सबसे बड़ी ताकत—युवा—क्या खुद को सुना हुआ महसूस कर रहा है? आखिर सवाल यही है... अमित शाह आज अलवर गए। वहां विकास की बातें हुईं। फिर निंबाहेड़ा गए। वहां अटल जी की विरासत और राष्ट्रवाद की बातें हुईं। लेकिन उसी दिन कुछ छात्र हिरासत में लिए गए, क्योंकि पुलिस के मुताबिक वे विरोध और काले झंडे दिखाने की तैयारी कर रहे थे। अब फैसला जनता को करना है— क्या लोकतंत्र की ताकत सिर्फ बड़े मंचों पर दिए गए भाषणों में है? या फिर उस छोटे से छात्र की आवाज में भी है, जो सत्ता के सामने खड़े होकर कहता है— "हमें भी सुनिए।" क्योंकि भारत का युवा सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि— "देश कितना आगे बढ़ा?" वह यह भी पूछ रहा है— "इस विकास की दौड़ में मेरा भविष्य कहां है?" और शायद यही वह सवाल है, जिसका जवाब किसी एक भाषण, किसी एक पार्टी या किसी एक चुनाव से नहीं दिया जा सकता। इसका जवाब काम से देना होगा।