'Gen-Z की नब्ज पहचानने में नाकाम रहे', शशि थरूर ने 'छात्रों की गूंज' पर कांग्रेस को दिखाया आईना नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी के युवाओं से जुड़ने के तरीके पर सवाल खड़े किए हैं। मुंबई में आयोजित IIMUN कार्यक्रम में बातचीत के दौरान थरूर ने कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' अभियान और छात्रों के बीच हुए आंदोलन की तुलना करते हुए कहा कि पार्टी जिन मुद्दों को पहले से उठा रही थी, उन्हीं मुद्दों पर दूसरे समूहों को ज्यादा प्रभाव मिला। थरूर के बयान के बाद कांग्रेस की युवा रणनीति और खास तौर पर Gen-Z वोटर्स के साथ पार्टी के संवाद को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस ने मुद्दे उठाए, फिर असर कम क्यों रहा? शशि थरूर के मुताबिक पेपर लीक, छात्रों की समस्याएं और शिक्षा से जुड़े मुद्दे कांग्रेस और राहुल गांधी पहले ही उठा चुके थे। पार्टी ने इन मुद्दों को लेकर 'छात्रों की गूंज' जैसे अभियान के जरिए युवाओं तक पहुंचने की कोशिश भी की। लेकिन थरूर ने इस बात पर सवाल उठाया कि अगर वही मुद्दे कोई दूसरा छात्र समूह या आंदोलन ज्यादा प्रभावी तरीके से युवाओं के बीच ले जाता है, तो कांग्रेस को यह समझना होगा कि उसके संदेश में कमी कहां रह गई। उन्होंने संकेत दिया कि सिर्फ किसी मुद्दे को उठाना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि उस मुद्दे को युवाओं तक किस भाषा, माध्यम और तरीके से पहुंचाया जा रहा है। Gen-Z की नब्ज समझने का सवाल थरूर की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Gen-Z को लेकर था। उनके बयान का संकेत था कि आज की युवा पीढ़ी की राजनीतिक सोच और संवाद का तरीका पिछली पीढ़ियों से अलग है। सोशल मीडिया, डिजिटल कंटेंट और सीधे संवाद के दौर में युवा केवल राजनीतिक भाषण या पारंपरिक अभियानों से प्रभावित नहीं होते। ऐसे में कांग्रेस को यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह युवाओं की बदलती पसंद और उनके मुद्दों को सही तरीके से समझ पा रही है। राहुल गांधी का कैंपेन भी चर्चा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से छात्रों और पेपर लीक से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया गया है। पार्टी ने इन्हीं मुद्दों के आधार पर युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। इसके बावजूद अगर छात्र आंदोलनों को ज्यादा समर्थन मिलता दिखाई देता है, तो थरूर के मुताबिक यह पार्टी के लिए सोचने का विषय है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन सा मुद्दा उठाया गया, बल्कि यह भी है कि युवा उस मुद्दे को किस रूप में स्वीकार कर रहे हैं। क्या मैसेज देने के तरीके में है कमी? थरूर की टिप्पणी को कांग्रेस की संचार रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। आज Gen-Z सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, छोटे वीडियो, मीम्स, लाइव इंटरैक्शन और तेज संवाद के जरिए राजनीतिक मुद्दों से जुड़ रही है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती यह है कि वे युवाओं तक पहुंचने के लिए पारंपरिक राजनीतिक भाषा से आगे कैसे बढ़ें। थरूर के बयान से यह सवाल सामने आता है कि क्या कांग्रेस युवाओं के मुद्दे तो उठा रही है, लेकिन उन्हें युवाओं की भाषा और उनके पसंदीदा माध्यम से प्रभावी तरीके से नहीं पहुंचा पा रही? छात्र राजनीति में बदल रहा है माहौल भारत में छात्र और युवा राजनीति लंबे समय से राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण रही है। हालांकि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ युवा राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी का तरीका भी बदल रहा है। अब किसी अभियान की सफलता केवल रैलियों या बड़ी सभाओं से तय नहीं होती। सोशल मीडिया पर उसकी पहुंच, युवाओं की भागीदारी और संदेश के वायरल होने की क्षमता भी महत्वपूर्ण हो गई है। यही कारण है कि थरूर की टिप्पणी को कांग्रेस की भविष्य की युवा रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। थरूर ने पार्टी को दिया आत्ममंथन का संकेत शशि थरूर का बयान सीधे तौर पर कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक सवाल खड़ा करता है—अगर पार्टी किसी मुद्दे को पहले से उठा रही है, लेकिन युवा उस मुद्दे से जुड़ने के लिए किसी दूसरे मंच को ज्यादा प्रभावी मान रहे हैं, तो पार्टी को अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। यह कमी संदेश में हो सकती है, अभियान के तरीके में हो सकती है या फिर युवाओं के साथ सीधे संवाद की शैली में। थरूर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश की राजनीति में युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाता लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती थरूर की बात का व्यापक संदेश यही है कि युवाओं के मुद्दे उठाना और युवाओं की राजनीतिक भाषा समझना दो अलग-अलग चीजें हैं। कांग्रेस अगर Gen-Z के