झारखंड में लगेगा राष्ट्रपति शासन? जानिए क्या है अनुच्छेद 356 और नियम

झारखंड में छात्र आंदोलन के बीच राष्ट्रपति शासन की चर्चा तेज है। जानिए संविधान का अनुच्छेद 356 क्या है, किन परिस्थितियों में लागू होता है और JPSC आंदोलन से इसका क्या संबंध है।

नन की बैछार पर डांस करता छात्र

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झारखंड में छात्र आंदोलन के बीच क्या लग सकता है राष्ट्रपति शासन? जानिए क्या है अनुच्छेद 356 का प्रावधान

JPSC समेत प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन जारी; जानिए किन परिस्थितियों में राज्य में लगाया जा सकता है राष्ट्रपति शासन

रांची: झारखंड में JPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार चर्चा में है। प्रदर्शनकारी छात्र अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं और विधानसभा के घेराव की कोशिश भी कर रहे हैं। आंदोलन के बीच अब राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि अगर राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ती है तो क्या केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकती है?

हालांकि, केवल किसी बड़े छात्र आंदोलन, प्रदर्शन या कानून-व्यवस्था की चुनौती के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल एक गंभीर संवैधानिक परिस्थिति में किया जाने वाला प्रावधान है। इसके लिए यह देखना जरूरी होता है कि क्या राज्य सरकार संविधान के अनुसार शासन चलाने की स्थिति में रह गई है या नहीं।

क्या है अनुच्छेद 356?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 उस स्थिति से संबंधित है, जब किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति राज्य के संबंध में उद्घोषणा जारी कर सकते हैं।

आम तौर पर राज्यपाल की रिपोर्ट इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्यपाल यदि यह रिपोर्ट करते हैं कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन चलाने की स्थिति में नहीं है, तो केंद्र सरकार उस स्थिति की समीक्षा कर सकती है।

इसके बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 के तहत कार्रवाई कर सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि किसी राज्य में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन होना और संवैधानिक तंत्र का विफल होना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं।

क्या झारखंड में मौजूदा छात्र आंदोलन से 356 लागू हो सकता है?

मौजूदा परिस्थितियों में केवल छात्रों के आंदोलन के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू होने की बात कहना जल्दबाजी होगी।

अगर हजारों छात्र सड़कों पर उतरते हैं, विधानसभा का घेराव करने की कोशिश करते हैं या कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव होता है, तो यह निश्चित रूप से कानून-व्यवस्था की चुनौती हो सकती है। लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि राज्य की संवैधानिक व्यवस्था विफल हो गई है।

राष्ट्रपति शासन की जरूरत पर विचार करने के लिए यह देखना होगा कि क्या राज्य सरकार प्रशासन चलाने में पूरी तरह असमर्थ हो गई है।

मसलन, क्या सरकार कानून का शासन कायम रखने में असफल है? क्या प्रशासनिक व्यवस्था काम नहीं कर रही है? क्या विधानसभा संवैधानिक तरीके से काम करने में असमर्थ हो गई है? क्या राज्य सरकार संविधान के अनुसार शासन चलाने की स्थिति में नहीं है?

इन सवालों के जवाब अगर गंभीर रूप से राज्य सरकार के खिलाफ जाते हैं, तभी अनुच्छेद 356 की संवैधानिक चर्चा मजबूत हो सकती है।

सिर्फ कानून-व्यवस्था बिगड़ना काफी नहीं

राष्ट्रपति शासन को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर कानून-व्यवस्था की समस्या को संवैधानिक तंत्र की विफलता नहीं माना जाता।

किसी राज्य में बड़ा आंदोलन हो सकता है, लंबे समय तक प्रदर्शन चल सकता है और पुलिस-प्रशासन के सामने चुनौती पैदा हो सकती है। लेकिन अगर राज्य सरकार प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था को चलाने में सक्षम है, तो केवल आंदोलन के आधार पर अनुच्छेद 356 लागू करना आसान नहीं है।

इसके विपरीत, यदि परिस्थितियां इतनी गंभीर हो जाएं कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार शासन चलाने में ही असमर्थ हो जाए, तो स्थिति अलग हो सकती है।

यानी राष्ट्रपति शासन के लिए केवल आंदोलन की गंभीरता नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन की वास्तविक स्थिति महत्वपूर्ण होती है।

राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रक्रिया क्या है?

अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रक्रिया कई संवैधानिक चरणों से गुजरती है।

राज्यपाल की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण आधार हो सकती है। इसके अलावा राष्ट्रपति अन्य माध्यमों से मिली जानकारी के आधार पर भी यह संतोष बना सकते हैं कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार शासन नहीं चला पा रही है।

यदि राष्ट्रपति उद्घोषणा जारी करते हैं, तो इसे संसद के दोनों सदनों के सामने रखना जरूरी होता है।

राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को दो महीने के भीतर लोकसभा और राज्यसभा दोनों से मंजूरी मिलनी आवश्यक है। संसद की मंजूरी के बाद इसे निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे जारी रखा जा सकता है।

राष्ट्रपति शासन सामान्य तौर पर छह-छह महीने की अवधि में बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसकी अधिकतम अवधि तीन वर्ष है। एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए संविधान में अतिरिक्त शर्तें भी निर्धारित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी लगाई हैं सीमाएं

अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर भारत में लंबे समय तक राजनीतिक विवाद रहे हैं। शुरुआती दशकों में कई बार राज्य सरकारों को हटाने के लिए इस प्रावधान के इस्तेमाल पर सवाल उठे।

इसी संदर्भ में एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ का 1994 का सुप्रीम कोर्ट फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस फैसले ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की संतुष्टि पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है। अदालत यह जांच सकती है कि राष्ट्रपति शासन लगाने के पीछे पर्याप्त संवैधानिक आधार मौजूद था या नहीं।

इस फैसले के बाद केंद्र सरकार के लिए किसी निर्वाचित राज्य सरकार को केवल राजनीतिक मतभेद या सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या के आधार पर हटाना अधिक कठिन हो गया।

झारखंड में पहले भी लग चुका है राष्ट्रपति शासन

झारखंड 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। राज्य के गठन के बाद राजनीतिक अस्थिरता के अलग-अलग दौर में राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है।

राज्य में 2009, 2010 और 2013 में राष्ट्रपति शासन की स्थिति बनी थी। इन घटनाओं में राजनीतिक अस्थिरता और सरकार गठन से जुड़ी परिस्थितियां प्रमुख कारणों में रही थीं।

हालांकि मौजूदा छात्र आंदोलन की तुलना उन परिस्थितियों से सीधे नहीं की जा सकती। उस समय की राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं, जबकि वर्तमान मुद्दा मुख्य रूप से छात्रों की मांगों और परीक्षाओं से जुड़ा आंदोलन है।

JPSC विवाद में सरकार के सामने क्या चुनौती है?

छात्र आंदोलन का मुख्य मुद्दा JPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। लंबे समय से चल रहे प्रदर्शन के कारण राज्य सरकार के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।

सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह छात्रों की शिकायतों का समाधान करने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था भी बनाए रखे।

अगर बातचीत, जांच और प्रशासनिक कदमों के जरिए आंदोलन को नियंत्रित किया जाता है और सरकारी संस्थाएं सामान्य रूप से काम करती रहती हैं, तो इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता नहीं माना जाएगा।

निष्कर्ष: आंदोलन और राष्ट्रपति शासन के बीच बड़ा संवैधानिक अंतर

झारखंड में छात्र आंदोलन के बीच अनुच्छेद 356 की चर्चा जरूर शुरू हो सकती है, लेकिन सिर्फ आंदोलन या विधानसभा घेराव की कोशिश से राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हो जाता।

इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि राज्य की संवैधानिक व्यवस्था इस स्तर तक विफल हो गई है कि मौजूदा सरकार संविधान के अनुसार शासन चलाने में असमर्थ है।

इसलिए फिलहाल झारखंड में राष्ट्रपति शासन की संभावना को एक संवैधानिक सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए, कि तय राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि छात्र आंदोलन कितना बढ़ता है, सरकार किस तरह प्रतिक्रिया देती है और राज्य में प्रशासनिक एवं संवैधानिक व्यवस्था किस तरह काम करती है।

 


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