वंदे मातरम् का पूरा इतिहास: 1875 से 2026 तक, जिन्ना-नेहरू विवाद से 1950 के संवैधानिक फैसले तक

वंदे मातरम् का पूरा इतिहास जानिए—1875 में रचना से 1905 के स्वदेशी आंदोलन, 1937 के जिन्ना-नेहरू विवाद, कांग्रेस के फैसले और 1950 में राष्ट्रीय गीत के दर्जे तक।

वंदे मातरम् का पूरा इतिहास: 1875 से 2026 तक, जिन्ना-नेहरू विवाद से 1950 के संवैधानिक फैसले तक

Knowledge

वंदे मातरम्: 1875 से 2026 तक पूरी कहानी

साहित्य से स्वतंत्रता आंदोलन तक, जिन्नानेहरू विवाद से संविधान सभा के फैसले तक

क्या वंदे मातरम् को कभी बंद किया गया था? क्या नेहरू ने जिन्ना के दबाव में इसके पद हटाए? 1937 में कांग्रेस ने वास्तव में क्या फैसला लिया था? और 1950 में इसेजन गण मनके साथ क्या दर्जा मिला?

वंदे मातरम् भारत के इतिहास का ऐसा गीत है जिसकी यात्रा साहित्य, राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता आंदोलन, सांप्रदायिक राजनीति और संवैधानिक व्यवस्थाइन सभी से होकर गुजरती है।

1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना के रूप में सामने आया यह गीत आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक बना। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया और 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध तथा स्वदेशी आंदोलन के दौरानवंदे मातरम्एक शक्तिशाली राजनीतिक उद्घोष बन गया।

लेकिन 1930 के दशक में गीत के कुछ हिस्सों की धार्मिक imagery और उसके राष्ट्रीय सार्वजनिक उपयोग को लेकर विवाद सामने आया। 1937 में कांग्रेस के भीतर इस पर विचार हुआ और कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय सभाओं में इसके पहले दो पद गाने की सिफारिश की।

इसके बाद भी वंदे मातरम् की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा समाप्त नहीं हुई। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मनभारत का राष्ट्रगान होगा औरवंदे मातरम्”, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा।

यही इस पूरे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बात है।


1. वंदे मातरम् की शुरुआत कब हुई?

वंदे मातरम् के रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय थे।

भारत सरकार के 150वीं वर्षगांठ संबंधी आधिकारिक backgrounder के अनुसार, गीत का पहला प्रकाशन 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका Bangadarshan में हुआ। बाद में इसे बंकिमचंद्र ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ।

यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतर समझना जरूरी है।

वंदे मातरम् पहले एक स्वतंत्र रचना के रूप में अस्तित्व में आया और बाद में आनंदमठ में शामिल हुआ।

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने भी अपने बयान में इसी तथ्य को रेखांकित किया था कि गीत आनंदमठ में दिखाई देता है, लेकिन वह उपन्यास से पहले लिखा गया था और इसलिए गीत को उसके साहित्यिक संदर्भ से अलग भी देखा जाना चाहिए।

एक जरूरी तथ्य

PIB के historical background में यह भी दर्ज है कि वंदे मातरम् मार्चअप्रैल 1881 के Bangadarshan अंक में standalone composition के रूप में प्रकाशित हुआ था। इसलिए “1875 का प्रकाशनऔर “1881 का standalone publication” दोनों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में समझना चाहिए।


2. ‘आनंदमठमें वंदे मातरम्

1882 में प्रकाशित आनंदमठ ने वंदे मातरम् को व्यापक साहित्यिक संदर्भ दिया।

उपन्यास में मातृभूमि कोमाताके रूप में देखने की कल्पना दिखाई देती है। गीत के शुरुआती हिस्से में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरताभूमि, जल, हरियाली और समृद्धिका वर्णन मिलता है।

वहीं आगे के हिस्सों में मातृभूमि की तुलना देवी-रूपों से की जाती है।

यही धार्मिक imagery बाद के दशकों में गीत को लेकर होने वाली बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

इसलिए वंदे मातरम् को समझने के लिए दो चीजें साथ-साथ देखना जरूरी है:

पहलामातृभूमि और प्रकृति का काव्यात्मक चित्रण।

दूसरादेवी-रूपक और धार्मिक imagery


3. 1896: कांग्रेस के मंच पर वंदे मातरम्

वंदे मातरम् की राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 1896 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन था।

इसी अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् गाया। भारत सरकार के historical record में भी इस घटना को दर्ज किया गया है।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि वंदे मातरम् अब केवल एक साहित्यिक रचना नहीं रहा।

यह राष्ट्रीय आंदोलन के सार्वजनिक राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बनने लगा।


4. 1905: बंगाल विभाजन और वंदे मातरम्

1905 में बंगाल विभाजन के बाद ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वदेशी और anti-partition movement तेज हुआ।

इसी दौर में वंदे मातरम् का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ा।

भारत सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, 7 अगस्त 1905 को वंदे मातरम् को राजनीतिक slogan के रूप में इस्तेमाल किया गया, जब विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के समर्थन में कलकत्ता में बड़ी सभा और जुलूस हुआ।

इस समय तक:

गीतराष्ट्रीय भावना

से आगे बढ़कर

वंदे मातरम्” → राजनीतिक प्रतिरोध का उद्घोष

बन चुका था।


5. ब्रिटिश शासन और वंदे मातरम्

वंदे मातरम् के राजनीतिक प्रभाव के साथ ब्रिटिश प्रशासन का विरोध भी सामने आया।

भारत सरकार के historical record के अनुसार, अप्रैल 1906 में बरिसाल में बंगाल प्रोविंशियल कॉन्फ्रेंस के दौरान सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम् के उद्घोष पर रोक लगाने की कार्रवाई हुई। कांग्रेस कार्यसमिति के 1937 के बयान में भी बरिसाल की घटना का उल्लेख है, जिसमें पुलिस लाठीचार्ज और वंदे मातरम् के badges हटाए जाने की बात कही गई थी।

इस दौर ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतिरोध की भाषा में और मजबूत कर दिया।


6. 1905 के बाद इसका राष्ट्रीय विस्तार

1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् बंगाल से बाहर भी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक के रूप में फैलने लगा।

PIB के historical record में दर्ज है कि उसी वर्ष कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय अवसरों के लिए अपनाए जाने की बात सामने आई।

इसके बाद वंदे मातरम्:

  • राजनीतिक सभाओं,
  • राष्ट्रीय आंदोलनों,
  • पत्र-पत्रिकाओं,
  • जुलूसों

और स्वतंत्रता आंदोलन की सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बनता गया।


7. विवाद की शुरुआत केवल 1937 में नहीं हुई

आज की राजनीतिक बहस में अक्सर ऐसा प्रस्तुत किया जाता है कि वंदे मातरम् का विवाद अचानक 1937 में शुरू हुआ।

ऐतिहासिक तस्वीर इससे अधिक जटिल है।

1937 तक पहुँचने से पहले भी अलग-अलग मौकों पर गीत के सार्वजनिक गायन और उसके धार्मिक संदर्भों को लेकर मतभेद सामने चुके थे।

इसलिए chronology को इस तरह समझना अधिक उचित है:

1905 — राष्ट्रवादी लोकप्रियता

आगे के दशकों मेंधार्मिक और राजनीतिक आपत्तियाँ

1937 — विवाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बना

यह distinction महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे 1937 को विवाद की शुरुआत के बजाय एक निर्णायक राजनीतिक चरण के रूप में समझा जा सकता है।


8. 1937: विवाद क्यों बढ़ा?

1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकारें बनाईं।

इसी समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक संबंध तनावपूर्ण हो रहे थे।

वंदे मातरम् को लेकर मुस्लिम लीग के नेताओं की आपत्तियों का एक आधार गीत के बाद के हिस्सों में आने वाली धार्मिक imagery थी।

विशेष रूप से मातृभूमि को देवी-रूपों से जोड़ने वाली अभिव्यक्तियों को लेकर यह तर्क दिया गया कि सभी धार्मिक समुदाय इसे समान रूप से स्वीकार नहीं कर सकते।

साथ ही आनंदमठ के ऐतिहासिक-साहित्यिक संदर्भ को भी इस बहस में जोड़ा गया।

यहाँ सावधानी जरूरी है:

सभी मुसलमान वंदे मातरम् के विरोध में थे कहना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक व्यापक दावा होगा।

सही भाषा है:

मुस्लिम लीग के नेताओं और कुछ मुस्लिम राजनीतिक वर्गों ने गीत के कुछ हिस्सों और उसके राष्ट्रीय सार्वजनिक उपयोग पर आपत्ति जताई।


9. 15 अक्टूबर 1937: जिन्ना की आपत्ति

1937 में मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की ओर से वंदे मातरम् के राष्ट्रीय उपयोग को लेकर आपत्तियाँ सामने आईं।

यह विवाद उस समय की कांग्रेसमुस्लिम लीग राजनीति से भी जुड़ा हुआ था।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है:

जिन्ना की आपत्ति के बाद जो हुआ, वह केवलजिन्ना ने कहा और नेहरू ने मान लियावाली दो-चरणीय कहानी नहीं थी।

इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर चर्चा हुई।


10. 20 अक्टूबर 1937: नेहरू का सुभाष बोस को पत्र

इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेजों में से एक जवाहरलाल नेहरू का 20 अक्टूबर 1937 का सुभाष चंद्र बोस को पत्र है।

Nehru Archive में उपलब्ध मूल दस्तावेज में नेहरू लिखते हैं कि बोस के सुझाव के अनुसार वह वंदे मातरम् पर रवींद्रनाथ टैगोर से चर्चा करेंगे।

नेहरू यह भी लिखते हैं कि उन्होंने Ananda Math का अंग्रेजी अनुवाद प्राप्त किया है और गीत की पृष्ठभूमि समझने के लिए उसे पढ़ रहे हैं।

यह दस्तावेज एक महत्वपूर्ण तथ्य दिखाता है:

विवाद पर कांग्रेस के भीतर विचार-विमर्श हो रहा था।

और नेहरू स्वयं इस विषय पर टैगोर की राय लेने की प्रक्रिया में थे।


11. क्या नेहरू ने जिन्ना के दबाव में अकेले फैसला किया?

यहाँ सबसे सावधानी से लिखने की जरूरत है।

उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह कहना कि:

नेहरू ने अकेले जिन्ना के दबाव में वंदे मातरम् के चार पद हटा दिए।

ऐतिहासिक घटनाक्रम को अत्यधिक सरल बना देता है।

20 अक्टूबर 1937 के नेहरूबोस पत्र से यह स्पष्ट है कि:

  • सुभाष बोस ने इस मुद्दे पर नेहरू से बात की;
  • नेहरू ने टैगोर से सलाह लेने की बात कही;
  • नेहरू आनंदमठ पढ़ रहे थे;
  • और कांग्रेस के भीतर इस विषय पर विचार चल रहा था।

इसके बाद निर्णय कांग्रेस कार्यसमिति के स्तर पर आया।


12. सुभाष चंद्र बोस और टैगोर की भूमिका

1937 की बहस में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।

उपलब्ध archival material से पता चलता है कि बोस ने वंदे मातरम् के विवाद पर टैगोर की राय लेने की पहल की थी। नेहरू ने अपने 20 अक्टूबर के पत्र में इसी सुझाव का उल्लेख किया।

इससे यह स्पष्ट होता है कि 1937 का विवाद केवल:

जिन्ना बनाम नेहरू

नहीं था।

इसमें कांग्रेस के कई शीर्ष नेता और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे सांस्कृतिक व्यक्तित्व भी शामिल थे।


13. टैगोर की राय को कैसे समझें?

टैगोर की भूमिका को लेकर आज कई तरह के quotes और interpretations सोशल मीडिया पर मिलते हैं।

इसलिए publish करते समय बिना original letter देखे टैगोर के नाम से कोई लंबा verbatim quotation देना उचित नहीं है।

इतिहास की दृष्टि से सुरक्षित summary यह है:

टैगोर ने वंदे मातरम् के शुरुआती हिस्से की राष्ट्रीय उपयोगिता को स्वीकार किया, जबकि बाद के हिस्सों की धार्मिक imagery को बहुधार्मिक राष्ट्रीय मंच के संदर्भ में अलग तरह से देखने की आवश्यकता महसूस की गई।

1937 की कांग्रेस कार्यसमिति के official statement में भी यही distinction दिखाई देता हैगीत के स्वतंत्र राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय सभाओं के लिए पहले दो stanzas की सिफारिश की गई।


14. 28 अक्टूबर 1937: कांग्रेस कार्यसमिति का फैसला

अब आता है इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी पड़ाव।

28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् पर एक औपचारिक statement जारी किया।

इस statement में कांग्रेस कार्यसमिति ने कहा कि वंदे मातरम् का राष्ट्रीय जीवन में महत्व बहुत बढ़ चुका है।

साथ ही उसने गीत के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्तियों को भी स्वीकार किया।

फिर कार्यसमिति ने recommendation दी:

राष्ट्रीय सभाओं में जब वंदे मातरम् गाया जाए, तो केवल पहले दो stanzas गाए जाएँ।

साथ ही आयोजकों को यह स्वतंत्रता दी गई कि वे अन्य उपयुक्त गीत भी गा सकते हैं या वंदे मातरम् के स्थान पर कोई अन्य उपयुक्त गीत चुन सकते हैं।


15. क्या 1937 में वंदे मातरम् पर प्रतिबंध लगा था?

नहीं।

यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है।

1937 के CWC statement ने:

मूल साहित्यिक रचना पर प्रतिबंध नहीं लगाया।

इसने:

राष्ट्रीय gatherings में गाए जाने वाले हिस्से के बारे में recommendation दी।

अर्थात:

मूल गीत समाप्त नहीं हुआ था और ही उस पर कोई सामान्य कानूनी प्रतिबंध लगाया गया था।

राष्ट्रीय सभाओं के लिए पहले दो stanzas की recommendation की गई थी।

इसलिएवंदे मातरम् पर ban” कहना misleading हो सकता है।


16. क्या चार पदकाटदिए गए थे?

यह आज की बहस का सबसे विवादित सवाल है।

इसे दो हिस्सों में समझना चाहिए।

तथ्य

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय gatherings में पहले दो stanzas गाने की recommendation की।

लेकिन

इसका अर्थ यह नहीं था कि मूल साहित्यिक रचना को कानूनी रूप से संपादित करके उसके बाकी हिस्से समाप्त कर दिए गए।

इसलिए अधिक सटीक वाक्य होगा:

“1937 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के पहले दो पदों के उपयोग की सिफारिश की; मूल साहित्यिक रचना को समाप्त या प्रतिबंधित नहीं किया गया।


17. क्या यह नेहरू का अकेला फैसला था?

उपलब्ध दस्तावेज इसे केवल नेहरू का व्यक्तिगत फैसला बताने का आधार नहीं देते।

CWC का statement स्वयं Congress Working Committee का collective statement था। उसमें पहले दो stanzas को राष्ट्रीय gatherings के लिए recommend किया गया था।

2025 में राज्यसभा में हुई चर्चा में भी 1937 की CWC प्रक्रिया और उसमें गांधी, नेहरू, सुभाष बोस, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र प्रसाद और अन्य नेताओं की भागीदारी का उल्लेख किया गया।

इसलिए:

नेहरू ने अकेले चार पद हटाए

एक political interpretation हो सकती है, लेकिन इसे निर्विवाद historical fact की तरह लिखना उचित नहीं होगा।


18. 1947: आजादी के समय वंदे मातरम्

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् का महत्व 1937 के निर्णय के बाद समाप्त नहीं हुआ।

यह स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बना रहा।

हालाँकि 1947 के समारोहों और विशेष रूप से ऑल इंडिया रेडियो पर इसके प्रसारण से जुड़े कई विवरण लोकप्रिय historical accounts में मिलते हैं, लेकिन publication में यदि आप पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, सरदार पटेल और 15 अगस्त के AIR broadcast का specific दावा कर रहे हैं, तो AIR archival record का primary citation लगाना बेहतर होगा।

इसलिए publish-safe version में हम इतना ही लिखेंगे:

स्वतंत्रता के समय तक वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रीय प्रतीकों में बना हुआ था।

इस तरह हम उस claim को उतना ही रखते हैं जितना उपलब्ध source material सुरक्षित रूप से support करता है।


19. 24 जनवरी 1950: संविधान सभा का ऐतिहासिक फैसला

अब इस पूरी कहानी का संवैधानिक चरण आता है।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम चरण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने National Anthem के संबंध में घोषणा की।

उन्होंने कहा कि:

जन गण मनभारत का National Anthem होगा।

और इसके साथ उन्होंने कहा कि:

वंदे मातरम्”, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसेजन गण मनके समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा।

यह declaration Constitution of India के archived Constituent Assembly Debates में उपलब्ध है।


20. इसका वास्तविक अर्थ क्या था?

इस घोषणा के बाद भारत की राष्ट्रीय प्रतीक-व्यवस्था में दोनों गीतों की अलग-अलग पहचान बनी:

जन गण मन

National Anthem

वंदे मातरम्

National Song

लेकिन संविधान सभा की घोषणा में वंदे मातरम् को:

जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा

देने की बात कही गई थी।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि:

“1950 में वंदे मातरम् को हटा दिया गया।

दस्तावेज इसका उलटा दिखाता हैउसे स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका के लिए औपचारिक रूप से सम्मानित किया गया।


21. क्या 1950 में संसद ने कोई कानून बनाया था?

नहीं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण constitutional distinction है।

24 जनवरी 1950 की घोषणा संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा थी। यह किसी अलग संसदीय कानून के रूप में पारित Act नहीं था।

इसलिए article में यह लिखना ज्यादा सही होगा:

“24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा के माध्यम से जन गण मन और वंदे मातरम् की राष्ट्रीय स्थिति स्पष्ट की गई।


22. 1971 में कानून आयालेकिन वंदे मातरम् के लिए नहीं

भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान से संबंधित महत्वपूर्ण कानून है:

The Prevention of Insults to National Honour Act, 1971.

India Code में इस कानून की धारा 2 National Flag और Constitution से संबंधित है, जबकि Section 3 National Anthem के गायन को रोकने या उसमें व्यवधान डालने से संबंधित है।

इस कानून के text में वंदे मातरम् के लिए National Anthem जैसी अलग criminal provision नहीं है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि:

वंदे मातरम् गाने पर 1971 के कानून के तहत जेल हो सकती है।

ऐसा blanket statement statutory text से support नहीं होता।


23. Article 51A में क्या लिखा है?

संविधान के Article 51A(a) में नागरिकों के Fundamental Duties के तहत संविधान, उसके आदर्शों और संस्थाओं तथा National Flag और National Anthem के सम्मान की बात कही गई है।

Article 51A(a) में “National Song” शब्द नहीं है।

2017 में Supreme Court के सामने आए एक मामले में इसी बिंदु को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया था।

इसलिए:

National Anthem और National Song को संवैधानिक text में बिल्कुल एक जैसी statutory duty मानना सही नहीं होगा।


24. Bijoe Emmanuel मामला: क्या फैसला वंदे मातरम् पर था?

यहाँ भी एक common misconception है।

Bijoe Emmanuel v. State of Kerala (1986) का मामला National Anthem से संबंधित था, वंदे मातरम् से नहीं।

इस मामले में Supreme Court ने उन बच्चों की constitutional freedoms पर विचार किया जो अपने धार्मिक विश्वासों के कारण National Anthem नहीं गाते थे, लेकिन उसके दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।

इसलिए इस फैसले को सीधे:

“Supreme Court ने कहा कि वंदे मातरम् गाना जरूरी नहीं है।

लिखना सही नहीं होगा।

सही wording होगी:

“Bijoe Emmanuel मामला National Anthem से संबंधित था और उसमें freedom of conscience तथा constitutional freedoms के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर Supreme Court ने विचार किया।


25. 2017: Supreme Court ने वंदे मातरम् पर क्या कहा?

2017 में Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India से संबंधित proceedings में National Anthem, National Song और National Flag को बढ़ावा देने के लिए national policy बनाने की मांग उठी।

17 फरवरी 2017 के Supreme Court order को बाद में Delhi High Court के 17 अक्टूबर 2017 के फैसले में reproduce किया गया।

उसमें Supreme Court ने स्पष्ट किया कि:

Article 51A(a) में National Song का उल्लेख नहीं है; उसमें National Flag और National Anthem का उल्लेख है।

Supreme Court ने उसी proceeding में कहा कि वह National Song के विषय में debate में प्रवेश नहीं करना चाहता।

इसलिए 2017 के बारे में सबसे सुरक्षित wording है:

“2017 में Supreme Court ने Article 51A(a) के संदर्भ में कहा कि उसमें National Song का उल्लेख नहीं है और उस proceeding में National Song के प्रश्न पर बहस में प्रवेश नहीं किया।


26. 2017 में Delhi High Court का क्या हुआ?

17 अक्टूबर 2017 को Delhi High Court ने एक related petition पर फैसला दिया।

याचिका में वंदे मातरम् के लिए कानूनी guidelines और 1971 के कानून में amendment जैसी मांगें की गई थीं।

अदालत ने कहा कि वह सरकार को legislation बनाने के लिए mandamus जारी नहीं कर सकती और petition में मांगी गई राहत प्रदान नहीं की। फैसले में Supreme Court के 17 फरवरी 2017 के order का भी उल्लेख किया गया।

इसलिए 2017 के legal record को केवल:

“Supreme Court ने वंदे मातरम् को mandatory करने से मना कर दिया

के रूप में लिखना अधूरा होगा।


27. 2025–26: 150 साल बाद फिर राष्ट्रीय बहस

7 नवंबर 2025 को वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार ने सालभर चलने वाले nationwide commemoration की शुरुआत की।

सरकारी कार्यक्रम के अनुसार यह commemorative period 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक रखा गया।

इस अवसर पर:

  • commemorative coin जारी किया गया,
  • postage stamp जारी किया गया,
  • nationwide programmes की शुरुआत हुई,
  • और वंदे मातरम् के 150 वर्षों को स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय इतिहास से जोड़कर याद किया गया।

2025 में संसद में भी वंदे मातरम् के इतिहास और 1937 के विवाद को लेकर राजनीतिक बहस हुई। उस बहस में अलग-अलग दलों ने 1937 के घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत की।


28. आज की बहस में दो अलग narratives

आज वंदे मातरम् को लेकर मुख्यतः दो historical interpretations दिखाई देती हैं।

पहला दृष्टिकोण

इसमें यह तर्क दिया जाता है कि:

  • वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का महान प्रतीक था;
  • 1937 में मुस्लिम लीग की आपत्तियों के बाद कांग्रेस ने इसके उपयोग को सीमित किया;
  • और इस निर्णय को गीत के ऐतिहासिक महत्व के साथ अन्याय के रूप में देखा जा सकता है।

2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद में वंदे मातरम् के इतिहास पर बोलते हुए 1937 की घटनाओं और कांग्रेस नेतृत्व की भूमिका की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।

दूसरा दृष्टिकोण

दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया गया कि 1937 का निर्णय किसी एक नेता का फैसला नहीं था, बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच चर्चा और CWC के collective decision का परिणाम था।

2025 की राज्यसभा बहस में 1937 की correspondence और CWC meeting में गांधी, नेहरू, बोस, पटेल, आज़ाद और अन्य नेताओं की भागीदारी का उल्लेख किया गया।


29. दस्तावेजों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यदि राजनीतिक आरोपों से अलग होकर उपलब्ध primary documents को देखा जाए तो कुछ बातें अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं।

तथ्य 1

वंदे मातरम् का पहला प्रकाशन 1875 से जुड़ा है।

तथ्य 2

1896 में टैगोर ने इसे कांग्रेस के मंच पर गाया।

तथ्य 3

1905 में यह राजनीतिक slogan के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ।

तथ्य 4

1937 में गीत के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्तियाँ सामने आईं।

तथ्य 5

20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने सुभाष बोस को लिखा कि वह टैगोर से वंदे मातरम् पर चर्चा करेंगे और Ananda Math की पृष्ठभूमि पढ़ रहे हैं।

तथ्य 6

28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो stanzas गाने की recommendation की।

तथ्य 7

यह मूल साहित्यिक रचना पर कानूनी प्रतिबंध नहीं था।

तथ्य 8

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा देने की घोषणा की।

तथ्य 9

1971 के National Honour Act में National Anthem के लिए स्पष्ट statutory provision है; Vande Mataram के लिए वैसा provision नहीं है।

तथ्य 10

2017 में Supreme Court ने Article 51A(a) के संदर्भ में कहा कि उसमें National Song का उल्लेख नहीं है।


30. तो क्यानेहरू ने वंदे मातरम् खत्म कर दियाकहना सही है?

दस्तावेजों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा।

क्योंकि 1937 में:

  • गीत पर सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाया गया;
  • मूल रचना समाप्त नहीं की गई;
  • national gatherings के लिए पहले दो stanzas की recommendation की गई;
  • और बाद में 1950 में संविधान सभा ने इसे स्वतंत्रता संग्राम में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा दिया।

इसलिएनेहरू ने वंदे मातरम् खत्म कर दियाएक राजनीतिक interpretation हो सकता है, लेकिन इसे निर्विवाद historical fact की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है।


31. क्याजिन्ना ने वंदे मातरम् बंद करवायाकहना सही है?

इसे भी उसी सावधानी से देखना चाहिए।

मुस्लिम लीग और जिन्ना की ओर से वंदे मातरम् के national use पर आपत्तियाँ सामने आईंयह इतिहास का हिस्सा है।

लेकिन 1937 के बाद का निर्णय केवल जिन्ना की मांग और नेहरू की प्रतिक्रिया के बीच हुआ निर्णय नहीं था।

उपलब्ध documents दिखाते हैं कि कांग्रेस के भीतर चर्चा हुई, बोस और टैगोर की भूमिका रही और अंततः CWC ने अपना collective statement जारी किया।

इसलिए अधिक सटीक headline होगी:

वंदे मातरम् पर जिन्ना की आपत्ति से लेकर कांग्रेस के 1937 के फैसले तक: दस्तावेज क्या कहते हैं?”


32. सबसे महत्वपूर्ण फर्क: गीत, राष्ट्रीय उपयोग और कानून

वंदे मातरम् की पूरी कहानी समझने के लिए तीन चीजों को अलग रखना जरूरी है।

1. मूल साहित्यिक रचना

बंकिमचंद्र की पूरी composition

2. राष्ट्रीय आंदोलन में इस्तेमाल

विशेषकर पहले दो stanzas का व्यापक राष्ट्रीय उपयोग।

3. स्वतंत्र भारत की संवैधानिक स्थिति

जन गण मन — National Anthem

वंदे मातरम् — National Song, जिसे 24 जनवरी 1950 की घोषणा के अनुसार जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा दिया गया।

इन तीनों को एक ही चीज मानने से आज की बहस में काफी भ्रम पैदा होता है।


33. निष्कर्ष: 1875 से 2026 तक वंदे मातरम् की कहानी

वंदे मातरम् की कहानी केवल एक गीत की कहानी नहीं है।

यह कहानी शुरू होती है बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की साहित्यिक रचना से।

1875 में इसका पहला प्रकाशन हुआ।

1882 में यह आनंदमठ में शामिल हुआ।

1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस के मंच पर गाया।

1905 में बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक उद्घोष बन गया।

इसके बाद गीत राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ता गया, लेकिन उसके धार्मिक संदर्भों को लेकर मतभेद भी सामने आए।

1937 में यह विवाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति के बीच महत्वपूर्ण मुद्दा बना।

मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की आपत्तियों के बीच कांग्रेस के भीतर भी इस पर विचार हुआ।

20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को लिखा कि वह टैगोर से इस विषय पर चर्चा करेंगे और आनंदमठ की पृष्ठभूमि पढ़ रहे हैं।

28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो stanzas के उपयोग की recommendation की।

लेकिन यह मूल गीत पर कोई सामान्य कानूनी प्रतिबंध नहीं था।

और फिर 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने:

जन गण मनको National Anthem

और

वंदे मातरम्को समान सम्मान और समान दर्जे वाला National Song

मानने की व्यवस्था की।

1971 में National Honour Act आया, लेकिन उसमें National Anthem के लिए जो स्पष्ट statutory provision है, वैसा Vande Mataram के लिए नहीं है।

2017 में Supreme Court के सामने भी यह प्रश्न आया और अदालत ने Article 51A(a) के संदर्भ में स्पष्ट किया कि उसमें National Song का उल्लेख नहीं है।

और 2025–26 में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ ने इस पूरे इतिहास को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।

इसलिए सबसे संतुलित ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है:

“1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के पहले दो पदों के गायन की सिफारिश की थी। यह मूल साहित्यिक रचना पर कानूनी प्रतिबंध या उसके पूर्ण निषेध का निर्णय नहीं था। इस निर्णय तक पहुँचने में कांग्रेस के भीतर व्यापक विचार-विमर्श हुआ, जिसमें नेहरू, सुभाष बोस और टैगोर की भूमिका से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध हैं। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम् को उसके स्वतंत्रता-संग्राम संबंधी ऐतिहासिक महत्व के कारण जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा देने की घोषणा की।


Primary Sources / Documents

आप Jodhpur News पर article के अंत में यह section रख सकते हैं:

1. भारत सरकार — 150 Years of Vande Mataram

1875, 1881, 1896, 1905 और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े historical milestones के लिए।
PIB: 150 Years of Vande Mataram

2. Nehru Archive — 20 October 1937

नेहरू का सुभाष चंद्र बोस को मूल पत्र; टैगोर से सलाह और Ananda Math पढ़ने का उल्लेख।
Nehru Archive: To Subhas Chandra Bose, 20 October 1937

3. Congress Working Committee Statement — 28 October 1937

राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो stanzas की recommendation का contemporary statement
Congress Working Committee Statement on Vande Mataram, 28 October 1937

4. Constituent Assembly Debates — 24 January 1950

जन गण मन और वंदे मातरम् की संवैधानिक स्थिति पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा।
Constituent Assembly Debates — 24 January 1950

5. India Code — Prevention of Insults to National Honour Act, 1971

National Flag, Constitution और National Anthem से जुड़े statutory provisions
India Code — Prevention of Insults to National Honour Act, 1971

6. Delhi High Court judgment — 17 October 2017

National Song, Article 51A और 2017 Supreme Court order का judicial record
Delhi High Court judgment — Gautam R. Morarka v. Union of India

 


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