बृजभूषण शरण सिंह को बरी करने के फैसले को चार महिला पहलवानों ने चुनौती दी
नई दिल्ली, 20 दिसंबर (आईएएनएस)। यौन शोषण के मामले में बृजभूषण शरण सिंह को बरी करने के दिल्ली की एक अदालत के फैसले को चार महिला पहलवानों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। याचिका में सबूतों के गलत मूल्यांकन का आरोप लगाया गया है।
महिला पहलवानों का कहना है कि न्याय के सिद्धांतों के विपरीत निचली अदालत का फैसला पीड़ितों की आवाज को दबाने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि बृजभूषण शरण सिंह, जो भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के प्रमुख भी हैं, पर लगे आरोप गंभीर हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि अदालत ने मामले के दौरान पेश किए गए महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही को गलत तरीके से खारिज कर दिया, जिससे न्याय प्रक्रिया में गंभीर कमियाँ सामने आई हैं। याचिकाकर्ताओं ने फैसले को कानूनी त्रुटियों से भरा बताया है और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है।
पहलवानों ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हम न्याय प्रणाली में विश्वास करती हैं, लेकिन हमें लगता है कि वर्तमान फैसला न्याय के हित में नहीं है। हम उच्च न्यायालय से उम्मीद करते हैं कि वह पीड़ितों की आवाज सुने और न्याय सुनिश्चित करे।"
मामले की पृष्ठभूमि: बृजभूषण शरण सिंह पर दो अलग-अलग यौन शोषण के मामले दर्ज थे, जिनमें से एक में उन्हें जून 2023 में गिरफ्तार भी किया गया था। हालांकि, अदालत ने बाद में जमानत दे दी और अंततः उन्हें बरी कर दिया, जिससे खेल जगत और आम जनता के बीच आक्रोश फैल गया।
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वकीलों का कहना है कि उच्च न्यायालय में चुनौती देने से मामले में नई जान फूंक सकती है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय सबूतों की पुन: जांच कर सकता है और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए निचली अदालत को वापस भेज सकता है।
यह मामला न केवल कानूनी स्तर पर, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह खेल जगत में यौन शोषण के खिलाफ लड़ाई को प्रभावित करता है। महिला पहलवानों का कहना है कि वे सिर्फ अपने मामले के लिए नहीं, बल्कि अन्य खिलाड़ियों के लिए भी लड़ रही हैं, जिन्हें आवाज उठाने की हिम्मत नहीं है।
अब सभी की निगाहें उच्च न्यायालय पर टिकी हुई हैं, जो 15 दिनों के भीतर मामले की सुनवाई करने की संभावना है। वकीलों का कहना है कि अगर उच्च न्यायालय भी बरी करने के फैसले को बरकरार रखता है, तो याचिकाकर्ताओं के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प होगा।
यह मामला भारतीय खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि कानूनी प्रणाली में सुधार की कितनी आवश्यकता है ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।

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